Movie Review Daadi Ki Shaadi: कपिल शर्मा बड़े परदे पर फिर क्लीन बोल्ड, कहानी ने कर दी फ़्लॉप की कारस्तानी

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टीवी की दुनिया में अपार लोकप्रियता हासिल कर चुके कपिल शर्मा की बड़े परदे पर हीरो बनने की बेचैनी अब किसी से छिपी नहीं है। उनकी बतौर हीरो पहली फ़िल्म ‘किस किस को प्यार करूं’ से लेकर ‘फिरंगी’, ‘सन ऑफ मंजीत सिंह’, ‘इट्स मायलाइफ़’, ‘ज्विगाटो’, ‘क्रू’ और ‘किस किस को प्यार करूं 2’ तक, कपिल लगातार सिनेमा में अपनी जगह बनाने की कोशिश करते रहे हैं।

लेकिन, उनकी लगभग हर फ़िल्म बॉक्स ऑफिस पर दर्शकों की बेरुख़ी का शिकार हुई। अब नई फ़िल्म ‘दादी की शादी’ भी उसी कतार में खड़ी नजर आती है। कपिल का टीवी वाला सहज हास्य बड़े परदे की कहानी में बदलते ही बिखर जाता है।

असल समस्या सिर्फ कपिल शर्मा नहीं, बल्कि उनके स्टारडम को सिनेमाई सफलता में बदलने की मजबूरी भी है। हिंदी सिनेमा में छोटे परदे के सितारों को बड़े स्टार में बदलने के सपने पहले भी कई बार देखे गए हैं, लेकिन यहां कहानी सबसे अहम होती है और ‘दादी की शादी’ की कहानी बुरी तरह पुराने दौर में अटकी हुई लगती है।

पारिवारिक कॉमेडी, रिश्तों की भावुकता और शादी-ब्याह के इर्द-गिर्द घूमती यह पटकथा उस दौर की याद दिलाती है जब टीवी के संयुक्त परिवार वाले धारावाहिकों का प्रभाव ज्यादा था। आज के दौर में जहां स्टैंडअप कॉमेडी, डार्क ह्यूमर और सामाजिक व्यंग्य का दौर चल रहा है, वहां यह फ़िल्म अपने विषय और प्रस्तुति दोनों में पिछड़ी हुई महसूस होती है।

फ़िल्म को लेकर शुरुआती हाइप मुख्यतः नीतू कपूर और रिद्धिमा कपूर साहनी की जोड़ी तथा कपिल शर्मा की मौजूदगी तक सीमित रही। सोशल मीडिया और रेडिट जैसी जगहों पर भी दर्शकों का बड़ा वर्ग फ़िल्म को लेकर उत्साहित कम और संशय में ज्यादा दिखा।

फ़िल्म ‘दादी की शादी’ का संदेश पारिवारिक रिश्तों, बुजुर्गों की भावनाओं और दूसरी पारी की जिंदगी को लेकर सकारात्मक जरूर है, लेकिन इसकी प्रस्तुति इतनी सतही और खिंची हुई है कि भावनाएं दर्शकों तक पहुंचने से पहले ही थकने लगती हैं। सीमित बजट में बनाई गई यह फ़िल्म बार-बार टीवी सीरियल जैसी बनावट का अहसास कराती है।

निर्देशक आशीष आर मोहन ने इसे हल्की-फुल्की पारिवारिक कॉमेडी बनाए रखने की कोशिश की है, लेकिन पटकथा में नयापन नहीं है। कई दृश्य ऐसे लगते हैं मानो सिर्फ कपिल शर्मा के वन-लाइनर्स के सहारे आगे बढ़ रहे हों। फ़िल्म की सबसे बड़ी कमजोरी इसकी लंबाई और दोहराव है। दूसरे हिस्से में कहानी लगभग ठहर जाती है और दर्शक फ़िल्म से भावनात्मक रूप से जुड़ नहीं पाते।

ये ही सारी वजहें है कि तमाम कोशिशों के बावजूद यह फ़िल्म मनोरंजन से ज्यादा मजबूरी में बनाया गया प्रोजेक्ट जैसी लगती है।

तकनीकी पक्षों की बात करें तो फ़िल्म की सिनेमैटोग्राफी बहुत औसत स्तर की है। कैमरा वर्क में कोई ऐसा फ्रेम नहीं बनता जो लंबे समय तक याद रह सके। पारिवारिक फ़िल्मों वाली गर्माहट दिखाने के लिए रंगों और लाइटिंग का इस्तेमाल किया गया है, लेकिन उसमें भी टीवी शो जैसा बनावटीपन नज़र आता है।

फ़िल्म का संगीत भी बेहद साधारण है। कोई गीत थिएटर से बाहर निकलने के बाद याद नहीं रहता। बैकग्राउंड स्कोर कई जगह जरूरत से ज्यादा भावुक बनने की कोशिश करता है। जहां भी हल्की-फुल्की शारीरिक कॉमेडी या दृश्यात्मक हास्य रचा गया है, वह पुराने हिंदी टीवी कॉमेडी शो जैसा प्रतीत होता है। फ़िल्म का संपादन बहुत ढीला है और कई दृश्य आसानी से छोटे किए जा सकते थे।

‘दादी की शादी’ ऐसी कॉमेडी फ़िल्म है जिसे आराम से इग्नोर किया जा सकता है। हिंदी सिनेमा ने ‘अंदाज़ अपना अपना’, ‘हेरा फेरी’, ‘गोलमाल’, ‘चुपके चुपके’ और ‘मुन्ना भाई एमबीबीएस’ जैसी बेहतरीन कॉमेडी फिल्में देखी हैं, जिनमें हास्य के साथ संवेदना और मजबूत लेखन भी था। दुर्भाग्य से यह फ़िल्म उस स्तर के आसपास भी नहीं पहुंचती।

कपिल शर्मा का आकर्षण टीवी तक सीमित अधिक प्रभावी लगता है और बड़े परदे पर उनकी कॉमिक टाइमिंग अब पुरानी पड़ती दिखाई देती है। यह फ़िल्म शायद उनके प्रशंसकों को भी पूरी तरह संतुष्ट न कर पाए।

 

Movie Review: दादी की शादी

कलाकार: कपिल शर्मा, नीतू कपूर, सादिया खतीब, रिद्धिमा कपूर साहनी, सरथकुमार, तेजस्विनी कोल्हापुरे

निर्देशक: आशीष आर मोहन

लेखक: आशीष आर मोहन, बंटी राठौर, साहिल एस शर्मा

निर्माता: श्रद्धा अग्रवाल, अक्षित लाहोरिया, गुरजोत सिंह, गिन्नी कपिल शर्मा, कोमल शाहानी मोहन

स्टूडियो: आरटेक स्टूडियोज, बीईंगयू स्टूडियोज़, शिमला टॉकीज़

रिलीज़ डेट: 8 मई 2026

रेटिंग: ★★☆☆☆ (2/5)

Pankaj Shukla

pankajshuklaa@gmail.com

पंकज शुक्ल भारतीय पत्रकारिता और फ़िल्म आलोचना जगत का एक प्रतिष्ठित नाम हैं। तीन दशकों से अधिक समय से सक्रिय पंकज शुक्ल वरिष्ठ पत्रकार, लेखक, स्क्रिप्ट डॉक्टर और फ़िल्म समीक्षक के रूप में अपनी खास पहचान रखते हैं। वह भारत के उन शुरुआती फ़िल्म समीक्षकों में शामिल हैं जिन्होंने डिजिटल मीडिया में फ़िल्म लेखन की शुरुआत की। उन्होंने कई समाचार पत्रों, सैटेलाइट चैनलों और डिजिटल प्लेटफॉर्म के साथ शीर्ष प्रबंधन ग्रोथ पार्टनर के रूप में काम किया है। उनका लोकप्रिय कॉलम ‘बायोस्कोप विद पंकज शुक्ल’ हिंदी सिनेमा के स्वर्णिम दौर की यादों को जीवंत करता है, जबकि उनकी ऑडियो-वीडियो इंटरव्यू श्रृंखला ‘शुक्ल पक्ष विद पंकज शुक्ल’ फ़िल्मी हस्तियों के साक्षात्कारों के लिए नया मानक स्थापित कर चुकी है। पंकज शुक्ल ने भारत में फ़िल्मों पर पहला वीडियो न्यूज़ बुलेटिन ‘खबरें बॉलीवुड की’ शुरू किया। उन्होंने ‘बॉलीवुड बाज़ीगर’, ‘भूत बंगला’, ‘होनी अनहोनी’, ‘बच के रहना’ और ‘फोक स्टार्स: माटी के लाल’ जैसे चर्चित टीवी शोज़ बनाए। इसके अलावा, उन्होंने मिथुन चक्रवर्ती, मनोज तिवारी और मोनालिसा अभिनीत फीचर फ़िल्म ‘भोले शंकर’ का लेखन और निर्देशन भी किया है।

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