बाइस्कोप विद पंकज शुक्ल: फिल्म ‘पाकीजा’ के अनसुने किस्से

आज के ‘बाइस्कोप विद पंकज शुक्ल’ का क़िस्सा कमाल का है। है भी, कमाल के निर्देशक, कमाल अमरोही का।  कुछ साल पहले एक मुलाकात में उनके बेटे ताजदार ने कहा था, ‘फ़िल्म‘पाकीज़ा’ के बिना भारतीय सिनेमा का इतिहास अधूरा है।’फ़िल्म का वो मशहूर संवाद तो आपको भी याद ही होगा, ‘आपके पैर देखे। बहुत हसीन हैं। इन्हें जमीन पर मत रखिएगा। मैले हो जाएंगे।’ लेकिन, क्या आपको पता है कि परदे पर दिखे ये पैर मीना कुमारी के थे ही नहीं! ऐसे ही कुछ और दिलचस्प क़िस्से ‘पाकीज़ा’ के, आइए, साथ साथ पढ़ते हैं।

ताजदार की कही बात सोलह आने सही है और उनके पिता कमाल अमरोही की सिनेमा से मोहब्बत की ये अमिट निशानी है। ये और बात है कि इसी फ़िल्म के दौरान उनका अपनी माशूक़ मंजू (मीना कुमारी) से अलगाव हुआ। दोनों अलग अलग रहने लगे। और, इसी फ़िल्म को पूरा करने के लिए बरसों बाद दोनों फिर मिले।

 

दोनों ने बस इस फ़िल्मके लिए दोबारा मिलना मंजूर किया। दोनों ने प्रीमियर पर ये फ़िल्म साथ-साथ देखी और इसके बाद कमाल अमरोही की मंजू ने बस एक ही बात उनसे कही, ‘वादा करो, चांद! अब तुम दूसरी कोई फ़िल्म न बनाओगे।’

फ़िल्म‘पाकीज़ा’ रिलीज हुई तो लोग इसे देखने उतनी तादाद में आए नहीं, जितनी उम्मीद इस फ़िल्म में पैसा लगाने वालों को रही होगी। लेकिन, मौत का तमाशा देखने वाली इस दुनिया ने फ़िल्म की रिलीज के चंद हफ़्तों बाद ही मीना कुमारी के गुजर जाने पर इसे ब्लॉकबस्टरफ़िल्म बना दिया। अपने रिलीज़ के साल 1972 में ‘पाकीज़ा’ ने टिकट खिड़की पर सबसे ज़्यादा कारोबार करने वाली हिंदी फ़िल्म का तमगा हासिल किया।

 

फ़िल्म हफ्तों, महीनों तक चलती रही। कमाल अमरोही का इसने सारा अगला पिछला सब कर्ज सूद समेत चुकता कर दिया। ये अलग बात है कि इस फ़िल्म को इनाम देने में उस ज़माने ने कंजूसी बहुत बरती।

 

कमाल अमरोही ने खुद बताया था कि कैसे फ़िल्मफेयर पुरस्कार के एवज़ में पैसे मांगे गए। फ़िल्मफेयर पुरस्कारों मेंफ़िल्म‘पाकीज़ा’ के साथ हुई नाइंसाफी दुनिया को मालूम है ही। लेकिन, शायद ये बात कम लोगों को ही मालूम होगी कि इस नाइंसाफी को देख इसके खिलाफ आवाज सिर्फ अभिनेता प्राण ने ही उठाई थी।

उस साल के लिए जब फ़िल्मफेयर पुरस्कार बंटने शुरू हुए तो अभिनेता प्राण नेफ़िल्म‘बेईमान’ के लिए मिला अपना पुरस्कार लेने से मना कर दिया था। ‘बेईमान’ को ही उस साल फ़िल्म‘पाकीज़ा’ पर तवज्जो देते हुए सर्वश्रेष्ठ संगीत का पुरस्कार मिला। फ़िल्म‘बेईमान’ के संगीतकार थे शंकर जयकिशन और फ़िल्म‘पाकीज़ा’ के गुलाम मोहम्मद।

फ़िल्म‘मिर्ज़ा ग़ालिब’ के लिए सर्वश्रेष्ठ संगीत का राष्ट्रीय पुरस्कार जीत चुके बीकानेर के रहने वाले संगीतकार गुलाम मोहम्मद ने फ़िल्म‘पाकीज़ा’ में अपने संगीत का पूरा नूर उड़ेल दिया था। बरसों बरस मेहनत करके उन्होंने फ़िल्म के लिए गाने तैयार किए। हर गाना एक से एक बेहतरीन।

ये बात तो जगजाहिर है कि फ़िल्म‘पाकीज़ा’ को बनने में वक्त बहुत लगा। वजह रही फ़िल्म के निर्देशक कमाल अमरोही और उनकी पत्नी व फ़िल्म की हीरोइन मीना कुमारी के बीच चली अनबन।

कुछ ने कहा दोनों में धर्मेंद्र की वजह से झगड़ा हुआ। धर्मेंद्र और मीना कुमारी के क़िस्से उन दिनों खूब आम थे। धर्मेंद्र को इस फ़िल्म में कमाल अमरोही ने उसी रोल के लिए साइन किया था, जिस रोल को बाद में राजकुमार ने किया।

फ़िल्म के एक दो सीन में धर्मेंद्र की शूटिंग वाले सीन बाकी भी रहे, लेकिन वहीं जहां उनका चेहरा नहीं दिखना था। सिर्फ धर्मेंद्र के चलते ही फ़िल्म के तमाम हिस्सों की शूटिंग दोबारा करनी पड़ी हो ऐसा भी नहीं। फ़िल्म की तमाम रीलें पहले ब्लैक एंड व्हाइट में बनी थीं। फिर इसको वह रंगीन में शूट कर ही रहे थे कि सिनेमास्कोप आ गया।

कमाल अमरोही अपने सिनेमैटोग्राफर जोसेफ विरसचिंग की मदद से एमजीएम स्टूडियो से सिनेमास्कोप का लेंस मांग लाए। जोसेफ का फ़िल्म की शूटिंग के दौरान निधन हो गया जिसके बाद इसे पूरा करने में हिंदी सिनेमा के तमाम दिग्गज सिनेमैटोग्राफरों ने कमाल अमरोही की मदद की।

फ़िल्म की जब प्रोसेसिंग चल रही थी तो कमाल को इस बात का इल्म हुआ कि एमजीएम जैसी बड़ी कंपनी से लाया गया लेंस डिफेक्टिव था। ये रील के सेंटर में फोकस करने से चूक गया था।

ये बात एमजीएम को पता चली तो उसके प्रबंधन ने कमाल अमरोही से माफ़ी तो मांगी ही, उन्हें इस जानकारी को साझा करने का शुक्रिया अदा किया और ये लेंस भी उन्हें ही दे दिया। यही नहीं, इस लेंस की तमाम फ़ीस भी एमजीएम ने माफ कर दी। कमाल अमरोही की बतौर निर्देशक पहली फ़िल्म‘महल’ के सिनेमैटोग्राफर भी जोसेफ ही थे।

‘बाइस्कोप विद पंकज शुक्ल’ के पाठकों के लिए, यहां एक ख़ास बात और। और, वो ये कि कमाल अमरोही अपनी टीम से बेइंतहा प्यार करते थे। यहां तक कि फ़िल्म‘पाकीज़ा’ जब अपने मुहूर्त के 16 साल बाद रिलीज के लिए तैयार हुई और फ़िल्म वितरकों ने कमाल अमरोही पर नए जमाने के चलन के हिसाब से गाने बदलने का उन पर बहुत दबाव बनाया। तो, कमाल अमरोही ने इतना ही कहा कि गुलाम जिंदा होते तो शायद मैं सोचता भी, लेकिन वह साथ नहीं हैं, तो उनका एक गाना भी न बदला जाएगा।

गुलाम मोहम्मद ने फ़िल्म‘पाकीज़ा’ के लिए कुल 12 गाने बनाए थे, इस्तेमाल कमाल ने फ़िल्म में छह ही किए।

फ़िल्म‘पाकीज़ा’ के किस्से इतने हैं कि इन पर किताबें लिखी जा चुकी हैं। संजय लीला भंसाली जैसे निर्देशक बार बार इसे देखते हैं तो ये समझने के लिए कि आख़िर परदे पर भव्यता लाने के लिए किन बारीकियों का ध्यान रखना चाहिए।

फ़िल्म के गाने ‘चलते चलते यूं ही कोई मिल गया था..’ में जब कैमरा फव्वारे के पानी के बीच से होकर निकल जाता है, तो ये भंसाली जैसे फ़िल्मकारों के लिए रिसर्च का विषय बन जाता है कि आखिर ऐसा कैसे किया गया होगा।

अगर आप फ़िल्म‘पाकीज़ा’ का एक और गाना ‘इन्हीं लोगों ने ले लीना दुपट्टा मेरा’ देखेंगे तो इसका सेट देखकर हैरान रह जाएंगे। इस गाने में कमाल अमरोही के निर्देशन की असल बुलंदियां भी देखने को मिलती हैं। अपने कोठे पर नाचती साहिबजान के पीछे तमाम कोठे और दिखते हैं। छज्जों पर नाचती तमाम दूसरी नर्तकियां भी दिखती हैं। सब एक लय में हैं। सब एक ताल में हैं। कमाल अमरोही ने दर्जन भर से ज्यादा नर्तकियों को इस सीन में कैसे साधा होगा, ये वही समझ सकता है जिसने कैमरे के पीछे बतौर निर्देशक एक पल भी अगर बिताया हो।

फ़िल्म की कहानी और कैमरे का कमाल ऐसा कि 16 जुलाई 1956 को शुरू हुई फ़िल्म जब 4 फरवरी 1972 को रिलीज हुई तो कोई भी दर्शक ये न पकड़ पाया कि परदे पर कहां असली मीना कुमारी हैं और कहां उनकी डुप्लीकेट बनकर नाचतीं पद्मा खन्ना!

जी हां, ‘बाइस्कोप विद पंकज शुक्ल’ के पाठकों को इस फ़िल्म का वो मशहूर संवाद तो याद ही होगा, ‘आपके पैर देखे। बहुत हसीन हैं। इन्हें जमीन पर मत रखिएगा। मैले हो जाएंगे।’ यहां भी ये पैर मीना कुमारी के नहीं बल्कि उनके डुप्लीकेट के थे। और ये सब हुआ इसलिए कि फ़िल्म की दोबारा शूटिंग शुरू होने पर मीना कुमारी की सेहत ऐसी नहीं थी कि वह फ़िल्म के सारे सीन शूट कर पातीं।

फ़िल्म‘पाकीज़ा’ की मेकिंग की बात चलने पर अक्सर उन दो चिट्ठियों की चर्चा जरूर होती है जो कमाल अमरोही ने मीना कुमारी को और मीना कुमारी ने कमाल अमरोही को लिखीं।

दोनों साल 1955 में दक्षिण भारत घूमने निकले थे तो वहीं फ़िल्म‘पाकीज़ा’ की कहानी दोनों ने मिलकर सोची थी। मोहब्बत की तलाश में भटकती एक ऐसी पवित्र औरत की ये कहानी है जिसका किसी दूसरे से मोहब्बत करना गुनाह है।

फ़िल्म की शूटिंग के दौरान ही 1964 में दोनों में झगड़ा हुआ और मीना कुमारी अपने शौहर का घर छोड़ अपनी बहन मधु के पास रहने चली आईं। मधु की शादी उस जमाने में कॉमेडी के बेताज बादशाह महमूद से हुई थी। कमाल अमरोही उन्हें लेने आए। देर तक चली मान मनौव्वल के बाद भी जब मीना कुमारी ने कमरे का दरवाजा ना खोला तो कमाल अमरोही ये कहकर वहां से चले आए, ‘अब मैं कभी यहां वापस न आऊंगा। लेकिन आपके लिए मेरे घर के दरवाजे हमेशा खुले रहेंगे।’

प्यार में झगड़े के बाद भी कैसे एक दूसरे का मान सम्मान रखा जाता है, ये कमाल अमरोही और मीना कुमारी से सीखना चाहिए। दोनों में उम्र का बड़ा फासला था। फ़िल्म‘पाकीज़ा’ के रशेज (फ़िल्म की शूट की हुई रीलें) सुनील दत्त, नरगिस और तमाम दूसरे लोगों ने भी देखे और सबने कमाल अमरोही से यही गुजारिश की कि ये फ़िल्म पूरी होनी चाहिए।

इस पर कमाल अमरोही ने मीना कुमारी को चिट्ठी लिखकर फ़िल्म पूरी करने की गुजारिश की। और, मीना कुमारी ने तुरंत जवाबी चिट्ठी लिखकर उनकी बात मान ली। लेकिन, शर्त यही रखी कि वह फ़िल्म का मेहनताना बस एक सोने की गिन्नी के सिवा कुछ न लेंगी।

फ़िल्म दोबारा शुरू हुई तो पहले ही दिन फ़िल्माया गया गाना, ‘मौसम है आशिक़ाना’। मीना कुमारी का बढ़ा हुआ वजन छुपाने को उन्हें कुर्ता और लुंगी पहनाई गई। और, ये कुर्ता लुंगी उस दौर का सबसे मशहूर फैशन ट्रेन्ड हो गई।

और, चलते चलते फ़िल्म‘पाकीज़ा’ से जुड़ा एक किस्सा वहां का जहां इस फ़िल्म की शूटिंग हो रही थी यानी मध्यप्रदेश का शिवपुरी इलाका। हुआ यूं कि एक दिन शूटिंग से लौटते समय कमाल अमरोही की कार का पेट्रोल खत्म हो गया। मीलों दूर तक कोई पेट्रोल पंप था नहीं सो तय हुआ कि रात वहीं गुजारी जाए और सुबह कुछ इंतजाम किया जाएगा।

यूनिट के लोग वहीं आसपास इंतजाम करके सो गए। रात को वहां डकैतों ने धावा बोल दिया। लूटपाट चल ही रही थी कि डाकुओं के सरगना अमृत लाल को कमाल अमरोही के साथ मौजूद महिला के मीना कुमारी होने का पता चल गया।

फिर क्या? सारी बंदूकें नीचे। और, डाकुओं का सरदार मीना कुमारी के कदमों पर। उसने सारा सामान भी वापस करा दिया। और, बदले में मांगा सिर्फ एक दस्तख़त। ये ऑटोग्राफ मीनाकुमार की जिंदगी का सबसे यादगार ऑटोग्राफ़ रहा क्योंकि डाकुओं के उस सरगना ने ये दस्तखत मांगे थे अपने हाथ पर और इसे मीना कुमारी को लिखना पड़ा था, चाकू की नोक से।

फ़रवरी 2022 में, म्यूज़िक लेबल सारेगामा और अभिनेता बिलाल अमरोही (कमाल अमरोही के पौत्र) ने फ़िल्म ‘पाकीज़ा‘’  के निर्माण की पृष्ठभूमि में अमरोही और मीना कुमारी की प्रेम कहानी पर आधारित एक वेब सीरीज़ की घोषणा की थी। इस सीरीज़ का निर्माण यूडली फ़िल्म्स के बैनर तले किया जाना था और इसे तय कार्यक्रम के मुताबिक तीन साल पहले ही फ़्लोर चला जाना था।

इसके बाद, सितंबर 2024 में, निर्देशक सिद्धार्थ पी. मल्होत्रा ने फ़िल्म‘कमाल और मीना’ की घोषणा की, जो अमरोही परिवार के सहयोग से बनाई जा रही एक आधिकारिक बायोपिक है। यह फ़िल्म कमाल अमरोही और उनकी पत्नी मीना कुमारी के उथल-पुथल भरे रिश्ते पर केंद्रित बताई जाती है। फ़िल्म की पटकथा लिखने का ज़िम्म्मा भवानी अय्यर और कौसर मुनीर को मिला, गीत इरशाद कामिल को लिखने थे और संगीत ए. आर. रहमान का होना था। उसके बाद से इस फ़िल्म का कोई अपडेट आया नहीं है।

बाइस्कोप में आज इतना ही, जल्द ही फिर मिलेंगे किसी और सुपरहिट फ़िल्म के किस्सों के साथ..!

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