क्या आपको पता है कि आज ही के दिन साल 1975 में रिलीज़ हुई फ़िल्म ‘चुपके चुपके’ जिस एक ‘मकान’ में शूट हुई, वही अबसुपर स्टार अमिताभ बच्चन का आशियाना ‘जलसा’ है?
जिस साल फ़िल्म ‘शोले’ का जय, ‘अगर किसी ने हिलने की कोशिश की तो भून कर रख दूंगा’ वाले तेवर दिखा रहा था, उसी सालफ़िल्म‘चुपके चुपके’ का सुकुमार अपने दोस्त परिमल के जीजाजी को सबक सिखाने के साथ साथ वसुधा का प्रियतम भी बना था।अमिताभ बच्चन को पिछली सदी के महानायक का बीबीसी से मिला खिताब दिलाने में जिन फ़िल्मों का बड़ा योगदान रहा, उनमें से एक फ़िल्म रही है,‘चुपके चुपके’।
आज का ‘बाइस्कोप विद पंकज शुक्ल’ निर्देशक ऋषिकेश मुखर्जी की इसी फ़िल्म‘चुपके चुपके’पर है। अमिताभ बच्चन ने कुछ साल पहले अपनी एक ट्वीट में इसीफ़िल्म की एक फोटो साझा करते हुए लिखा, ‘ये घर जो इस पिक्चर में आप देख रहे हैं, वह अब मेरा घरा है। खरीदा हुआ। फिर से बनाया हुआ। तमाम फ़िल्में यहां शूट हुईं, ‘आनंद’, ‘नमक हराम’, ‘चुपके चुपके’, ‘सत्ते पे सत्ता’। ये तब फ़िल्म निर्माता एन सी सिप्पी का मकान हुआ करता था।’
इस ट्वीट में अमिताभ ने बहुत चतुराई से जलसा को अपना ‘घर’ और एन सी सिप्पी का ‘मकान’ बताया है। एन सी सिप्पी से अमिताभ बच्चन ने ये ‘घर’ कैसे हासिल किया, इसकी भी अलग ही कहानी है। इसके बारे में भी बताता हूं लेकिन, पहलेबात आज के ‘बाइस्कोप विद पंकज शुक्ल’ की फ़िल्म‘चुपके चुपके’ की मेकिंग की।
निर्देशक ऋषिकेश मुखर्जी ने फ़िल्म‘चुपके चुपके’ बंगाली सिनेमा के महानायकउत्तम कुमार औऱ माधवी मुखर्जी की फ़िल्म‘छद्मवेशी’ के रीमेक के तौर पर बनाई। पहले इस फ़िल्म में धर्मेंद्र और आशा पारेख की जोड़ी बननी थी। ऋषिकेश मुखर्जी ने आशा पारेख से इस फ़िल्म में कॉमेडी कराने का पक्का वादा कर रखा था। लेकिन, कहते हैं कि धर्मेंद्र का मन उन दिनों शर्मिला टैगोर पर अटका हुआ था।
ऋषिकेश मुखर्जी के लिए ये एक बहुत ही प्रयोगात्मक फ़िल्म थी और उस समय के माचो मैन या कहें कि ही मैन का कॉमिक अवतार बड़े परदे पर दिखाने के लिए वह कुछ भी करने को तैयार थे। लेकिन, धर्मेंद्र की शर्त थी कि हीरोइन होंगी तो, शर्मिला टैगोर। उनकी बात मानी गई। आशा पारेख फ़िल्म से बाहर हुईं। शर्मिला टैगोर अपने डिंपल वाले गालों के साथ फ़िल्म की हीरोइन बनीं। धर्मेंद्र की बल्ले बल्ले हुई।
लेकिन, आशा पारेख की इसके बाद फिर ऋषिकेश मुखर्जी से ढंग से बात नहीं हुई। ऋषिकेश मुखर्जी ने भी बाद की फ़िल्मों में उन्हें लेने के लिए बात भी चलाई, लेकिन आशा पारेख जैसी खुद्दार महिला ने उनकी बात ही दोबारा नहीं सुनी।
अमिताभ बच्चन और जया भादुड़ी दोनों इस फ़िल्ममेंबहुत चिरौरी करने के बाद आए। एक तरह से कहें तो बालहठ जैसा करके आए। ऋषिकेश मुखर्जी की फ़िल्म‘आनंद’ ने ही अमिताभ बच्चन को हिंदी सिनेमा में पहला ऐसा रोल दिया था जिससे लोगों ने उन्हें राह चलते पहचानना शुरू किया। जया भादुड़ी को भी फ़िल्म‘गुड्डी’ के लिए ऋषिकेश मुखर्जी ही पूना फ़िल्म इंस्टीट्यूट से खोज कर लाए थे।
अमिताभ बच्चन के अपने गाढ़े वक़्त में काम आने वाले तमाम लोग भले उनसे बाद में किसी न किसी बात पर नाराज़ होते रहे हों। लेकिन, ऋषिकेश मुखर्जी ने ताउम्र कभी अमिताभ को लेकर कुछ नहीं कहा। अमिताभ ने भी उनको ताउम्र अपना उस्ताद ही माना। जया का हालांकि बहुत ज्यादा रोल फ़िल्म में है नहीं। और, वह फ़िल्म की शूटिंग करते वक्त गर्भवती भी थीं।
ऋषिकेश मुखर्जी ने भी इस बात का पूरा ध्यान रखा कि बच्चन परिवार कीजल्द आने वालीलाडली उनकी फ़िल्म के सेट पर गर्भ में ही ग्लैमर सीख रही है। पूरी फ़िल्म में जब भी जया कैमरे के सामने होतीं तो वह या तो साड़ी से अपना बदन छुपाए रखतीं या फिर कैमरा कुछ यूं रखा जाता कि जया परदे पर गर्भवती न दिखें। फ़िल्म में वह वसुधा हैं। सुकुमार के प्रेम में पागल। ‘एस’ अक्षर लिखी अंगूठी वाला सीन तो आपको याद ही होगा।
अब आगे बढ़ने से पहले थोड़ी सी बात फ़िल्म‘चुपके चुपके’ के प्रोड्यूसर एन सी सिप्पी की कर लेते हैं, जिनके ‘मकान’ को अमिताभ बच्चन ने अपना ‘घर’ बनाया। कम लोगों को ही याद होगा कि जया भादुड़ी को हिंदी सिनेमा में स्थापित करने वाली फ़िल्म ‘गुड्डी’ और अमिताभ बच्चन को हिंदी सिनेमा में पहली हिट का स्वाद चखाने वाली फ़िल्म‘आनंद’, दोनों के निर्माता एन सी सिप्पी ही हैं।
एन सी सिप्पी के हां कहने पर ही अमिताभ बच्चन को फ़िल्म‘बॉम्बे टू गोवा’ मिली जिसे देख प्रकाश मेहरा ने उन्हें उनकी पहली सोलो हिट फ़िल्म ‘ज़ंजीर’ के लिए साइन किया। एन सी सिप्पी ने अमिताभ बच्चन और जया को लेकर फ़िल्म‘चुपके चुपके’ के बाद ‘मिली’ बनाई और अमिताभ बच्चन व रेखा को लेकर ‘आलाप’।
एन सी सिप्पी के दो बेटे हुए राज एन सिप्पी व रोमू एन सिप्पी। उनकी एक बेटी भी हुई मोहिनी एन सिप्पी। राज एन सिप्पी आगे चलकर फ़िल्म‘सत्ते पे सत्ता’ के निर्माता बने। कहते हैं कि एन सी सिप्पी के बेटे अपहरण करने की कोशिशें भी उनके इसी घर से हो चुकी थीं। जिन फ़िल्मों का जिक्र अमिताभ बच्चन ने अपनी ट्वीट में किया, वे सारी फ़िल्में एन सी सिप्पी की बनाई हुई हैं और जिस वक्त ये फ़िल्में बनीं एन सी सिप्पी ने पैसे बचाने के लिए अपने घर का इस्तेमाल इन फ़िल्मों की शूटिंग के लिए किया था।
इन फ़िल्मों से ही अमिताभ बच्चन इतने बड़े सुपरस्टार बने कि कहते हैं उनकी फ़िल्म‘सत्ते पे सत्ता’ की फीस के एवज में बाद में सिप्पी परिवार का ये ‘मकान’ अमिताभ बच्चन का ‘घर’ बन गया। हालांकि, फ़िल्म‘चुपके चुपके’ में काम करने के वक़्त अमिताभ बच्चन और जया भादुड़ी ने निर्माता एन सी सिप्पी से दमड़ी तक नहीं ली थी।
फ़िल्म‘चुपके चुपके’ के तमाम रिलीज़ पोस्टर्स में से एक में मुख्य चेहरा ओम प्रकाश का ही है। ये काम भी ऋषिकेश मुखर्जी ही कर सकते थे। ऋषिकेश मुखर्जी की फ़िल्में आम जिंदगी से सांसें पाने वाली फ़िल्में रही हैं। वह हमारे आसपास की ही कहानी कहते रहे। हमारे जाने पहचाने से किरदार तलाशते और उनको लेकर परदे पर बुन देते भावनाओं का एक ऐसा ताना बाना, जिसमें डूबते उतराते कब फ़िल्म पूरी हो जाती लोगों को पता ही नहीं चलता।
फ़िल्म‘चुपके चुपके’ ऋषिकेश मुखर्जी के करियर का माउंट एवरेस्ट कही जा सकती है। इस फ़िल्म के बाद ऋषिकेश मुखर्जी के करियर का अवरोह शुरू होता है। उन्होंने हालांकि अमोल पालेकर के साथ ‘गोलमाल’, रेखा के साथ ‘खूबसूरत’ जैसी कामयाब फ़िल्मेंफ़िल्म‘चुपके चुपके’के बाद बनाईं लेकिन, ‘चुपके चुपके’ तो बस ‘चुपके चुपके’ है।
धर्मेंद्र और शर्मिला टैगोर की जोड़ी ने फ़िल्म‘चुपके चुपके’ में जो रोमांस परदे पर जिया है, वह बहुत कम देखने को मिलता है। परिमल और सुलेखा की नई नई शादी हुई है। दोस्तों, रिश्तेदारों के यहां 30 डिनर, 30 लंच, 25 ब्रेकफास्ट और 15 टी-पार्टी करके दोनों बोर हो गए हैं। लेकिन, परिमल ज्यादा परेशान है सुलेखा के बार-बार अपने जीजाजी के यशगान से।
जीजाजी का ये किरदार जिया है शानदार अभिनेता ओमप्रकाश ने। फ़िल्म‘बुड्ढा मिल गया’में इससे पहले ऋषिकेश मुखर्जी ने ओम प्रकाश को फ़िल्म का टाइटल रोल दिया था, लेकिन यहां फ़िल्म की पूरी कहानी ही जीजाजी को चारों खान चित करने की परिमल की प्लानिंग पर है। उसका दोस्त सुकुमार इसमें उसकी मदद करता है। और, बाकी फिर जो कुछ होता है वह बस देखने से समझ आ सकता है, बताने से नहीं।
फ़िल्म‘चुपके चुपके’ में धर्मेंद्र, शर्मिला टैगोर, अमिताभ बच्चन, जया भादुड़ी, ओम प्रकाश, असरानी, डेविड, केश्टो मुखर्जी, उषा किरन सभी ने शानदार अभिनय किया है। ऋषिकेश मुखर्जी को फ़िल्म के संवादों से भी खूब मदद मिली। एक बानगी देखिए:
– कौन है?
– हम हैं साहेब
– खड़े खड़े क्या कर रहे हो?
– खड़ा खड़ा कुछ नहीं कर रहा, बस आके आके खड़े हुए हैं
– आके आके क्या होता है?
– आपने खड़े खड़े का दो बार प्रयोग किया, अच्छा लगा, इसीलिए हमने भी उसी छंद में आके आके बोलकर कविता का रस ले लिया।
ऋषिकेश मुखर्जी ने फ़िल्म‘चुपके चुपके’ से पहले धर्मेंद्र की छवि बदलने का कोशिश फ़िल्म‘सत्यकाम’ में भी की थी। लेकिन, फ़िल्म ‘चुपके चुपके’ ने क़ामयाबी की इतनी लंबी लकीर खींची कि बाकी सब इसके आगे फीका पड़ गया। ये फ़िल्मकेंद्र सरकार को भी इतनी संपूर्ण पारिवारिक मनोरंजक फ़िल्म लगी कि इसे साल 1980 में पूर्ण सूर्यग्रहण के समय दोपहर में दूरदर्शन पर प्रसारित किया गया ताकि लोग अपने घरों में ही रहें और नंगी आंखों से सूर्यग्रहण देखने की कोशिश न करें।






