बाइस्कोप विद पंकज शुक्ल: जब ‘आंधी’ बनी विवादों की वजह

फ़िल्म ‘आंधी’ पता नहीं किस मुहूर्त में बननी शुरू हुई। इसके बनने के पहले से लेकर बनने के बाद तक इसके इतने अफसाने बने कि इन पर अलग से एक फ़िल्म बन सकती है।‘बाइस्कोप विद पंकज शुक्ल’ में आज के क़िस्से इसी फ़िल्म ‘आंधी’ के जो आज ही के दिन साल 1975 में रिलीज़ हुई थी।

फ़िल्म की शूटिंग के दौरान संजीव कुमार का सुचित्रा सेन पर न्यौछावर हो जाना। गुलज़ार का बीच बचाव करना। फिर राखी का गुलज़ार से सवाल करना और बात इतनी बढ़ना कि दोनों का ‘बसेरा’ हीसाथ न रहना।

किसी एक फ़िल्म ने किसी का घर बिगाड़ दिया हो, ऐसा कम ही सुना गया है। और, किसी एक फ़िल्म ने अपने अपने हुनर के उस्ताद, दो दोस्तों के किस्से बना दिए हों, ऐसा भी कहां सुनने को मिलता है।

कमलेश्वर और गुलज़ार, साहित्य की दो धाराओं के खेवैया रहे हैं। दोनों की नावें अपने अपने किनारों पर कामयाबी की तमाम इबारतें फहरा चुकी हैं। लेकिन, यही एक फ़िल्म‘आंधी’ है जिसकी चर्चा जब भी होती है, कमलेश्वर की ‘काली आंधी’ का ज़िक्र भी आ ही जाता है।

दोनों की कहानियां अलग अलग हैं। दोनों के तेवर अलग अलग हैं। लेकिन, सवाल दोनों की लिखावट को लेकर एक ही रहा है, जिसका जवाब देने की गुलज़ार ने अलग अलग मौकों पर खूब कोशिशें भी कीं।

एक इंटरव्यू में गुलज़ार कहते हैं, “ये साफ़ करने की बहुत ज़रूरत है कि ‘आंधी’ की शुरूआत कैसे हुई? इस बारे में थोड़ा भ्रम लोगों में रहा है और ये इसके बावजूद रहा कि कमलेश्वरजी ने अपने जीतेजी इस बारे में स्थिति साफ कर दी थी। कमलेश्वर जी और मैं अच्छे मित्र रहे हैं। एक दिन उन्होंने पूछा कि क्या मैं निर्देशन करना चाहता हूं, अगर ऐसा है तो उनके पास एक कहानी है। दक्षिण भारत का एक निर्माता इसे बनाना चाहता था।”

“मैंने यही कहा कि मैं खुद को सौभाग्यशाली समझूंगा अगर मैं उनकी कहानी निर्देशित करने का मौका पा सका। हमने इसकी पटकथा पर काम करने का फैसला किया और उन्होंने निर्माता मल्लिक अर्जुन राव (मल्ली साब) से मुलाकात तय कर ली। लेकिन, मल्ली साब को कमलेश्वर जी की लिखी कहानी पसंद नहीं आई। कहानी बहुत खूबसूरत थी। एक होटल में इसकी पृष्ठभूमि रखी गई थी और सामाजिक स्थिति का इसमें अच्छा खाका खींचा गया था।”

“भूषण बनमाली के पास भी उस समय एक आइडिया था, शायद ए जे क्रोनिन के एक उपन्यास से प्रेरित था। मल्ली साब को वह पसंद आया। लेकिन भूषण ने तब माहौल को संभालते हुए कहा कि अभी उनके पास सिर्फ़ विचार है। इस पर फ़िल्म हम सब मिलकर तैयार करेंगे।”

“ये विचार बाद में ‘मौसम’ की शक़्ल में विकसित होकर सामने आया। तब मैं ‘आंधी’पहले से लिख रहा था। तय ये हुआ कि भूषण के सुनाए विचार पर सब मिलकर कहानी विकसित करेंगे और मैं साथ साथ ‘आंधी’ भी लिखता रहूंगा। कमलेश्वर जी ने दोनों कहानियों पर उपन्यास लिखे। एक का नाम रखा ‘काली आंधी’ और दूसरी का ‘आगामी अतीत’ जो दरअसल मेरा ही सुझाया नाम था।”

दोस्तों के काम को लेकर हुए भ्रम के अलावा एक भ्रम फ़िल्म‘आंधी’ की शूटिंग के दौरान गुलज़ार की पत्नी राखी को भी हुआ। राखी की पहली शादी सिर्फ 16 साल की उम्र में बंगाली फ़िल्म निर्देशक और पत्रकार अजय बिस्वास से हुई थी। यह शादी चल नहीं पाई। जिस वक्त राखी ने फ़िल्मों में अपनी शुरुआत की, गुलज़ार उस समय फ़िल्में लिखने के मामले में एक बड़ा नाम बन चुके थे। साथ ही वह अभिनेत्री मीना कुमारी के साथ संबंधों को लेकर भी चर्चा में रहे।

उसी दौरान एक फ़िल्मी पार्टी में राखी की मुलाकात गुलज़ार से हुई। बताया जाता है कि गुलज़ार पहली ही मुलाकात में राखी को अपना दिल दे बैठे थे। इन दोनों ने बात को आगे बढ़ाने में बिल्कुल भी देर नहीं की और वर्ष 1973 में ही शादी कर ली। राखी शादी के बाद फ़िल्मों में काम करना चाहती थीं जबकि गुलज़ार ऐसा नहीं चाहते थे। ये उन दिनों की बात है जब गुलज़ार अपनी फ़िल्म ‘आंधी’ के लिए कश्मीर गए। उनके साथ राखी भी गईं।

पुरानी फ़िल्म पत्रिकाओं में ज़िक्र मिलता है कि फ़िल्म के मुख्य कलाकार संजीव कुमार ने एक शाम शराब थोड़ी ज्यादा पी ली। ये देखते हुए सुचित्रा अपने कमरे में जाने लगीं लेकिन संजीव ने उनका हाथ पकड़ लिया और जाने नहीं दिया। जब इन दोनों के बीच में थोड़ी छीना झपटी होने लगी है तो बीच में गुलज़ार आ गए।

गुलज़ार ने संजीव से सुचित्रा का हाथ छुड़ाया और उन्हें उनके कमरे तक छोड़ने गए। सुचित्रा को कमरे में छोड़कर गुलज़ार वापस आ रहे थे तो रास्ते में राखी खड़ी हुई थीं। इसके बाद जो कुछ हुआ, उसके तमाम अफसाने हैं। कोई कहता है गुलज़ार ने उस दिन राखी पर हाथ उठा दिया था तो कोई कुछ। गुलज़ार ने अपनी गलती भी बाद में मानी। सब कुछ किया। लेकिन, राखी टस से मस न हुईं। फ़िल्म‘आंधी’ ने ही उनका वो घर तबाह कर दिया, जिसका नाम उन्होंने ‘बसेरा’ रखा था।

तीसरी ‘आंधी’ इस फ़िल्म को लेकर सियासत में आई। गुलज़ार ये मानते हैं कि इस फ़िल्म को बनाते समय उन्होंने सुचित्रा सेन को उस वक्त की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के हाव भाव समझने के लिए कहा था। लेकिन बस एक संदर्भ के लिए। फ़िल्म की कहानी किसी भी तरह से इंदिरा और फीरोज के प्रेम की कहानी नहीं थी। लेकिन, समय उस समय ऐसा था कि कोई किसी की सुनता कहां था।

हर वितरक को बस थिएटर से पैसा चाहिए होता था। दक्षिण भारत के किसी उतावले फ़िल्म वितरक ने पोस्टर चिपकवा दिए जिन पर लिखा होता, ‘परदे पर देखिए अपनी प्रधानमंत्री को’। वहीं दिल्ली के एक अखबार में विज्ञापन छपा, ‘आजाद भारत की एक महान महिला नेता की कहानी’। लोगों को गॉसिप करने का मसाला मिल रहा था तो बताते हैं इंदिरा गांधी ने अपने दो विश्वस्त सिपहसालारों को ये फ़िल्म देखने को कहा।

फ़िल्म देखी गई। उस समय के सूचना और प्रसारण मंत्री इंद्र कुमार गुजराल को भी फ़िल्म पसंद आई। किसी को कहीं से भी इसमें कोई खोट नहीं दिखा। लेकिन सियासी ‘तांडव’ शुरू होने में देर ही कितनी लगती है। गुजरात में चुनाव था और विपक्षी पार्टियों ने फ़िल्म के वे सीन लोगों के बीच खूब प्रचारित किए गए जिनमें सुचित्रा सेन शराब और सिगरेट का सेवन करते दिखती हैं। ऊपर से फ़िल्म में सुचित्रा सेन का रहन सहन और लुक्स बिल्कुल इंदिरा गांधी जैसे।

मामला बिगड़ता देख फ़िल्म‘आंधी’ पर इंदिरा सरकार ने तब बैन लगा दिया जब वह पांच हफ्ते बाद सिनेमाघरों में अपनी सिल्वर जुबली मनाने वाली थी। फ़िल्म किसी तरह से इंदिरा गांधी की जीवनी न लगे, इसके लिए इसमें फेरबदल भी किए गए। लेकिन, बात बनी नहीं। बाद में ख़ैर इंदिरा सरकार ही नहीं रही। केंद्र में जनता पार्टी की सरकार बनी तो फ़िल्म‘आंधी’ पूरे देश ने अपने घरों में बैठकर अपने टेलीविजन पर देखी।

और, जिन्होंने भी ये फ़िल्म देखी है उनको कुछ याद रह जाता है तो फ़िल्म में संजीव कुमार और सुचित्रा सेन की बेमिसाल अदाकारी। और, राहुल देव बर्मन का संगीत। फ़िल्म‘आंधी’ की गिनती हिंदी सिनेमा की क्लासिक्स में होती है। जैसा कि हर कालजयी फ़िल्म के साथ होता ही है, इसके साथ भी ये हुआ कि वितरकों को इसकी धार ही समझ न आई। वह आख़िर तक इसी सोच में उलझे रहे कि इसे आर्ट फ़िल्म की तरह प्रचारित करें या कि कमर्शियल सिनेमा की तरह।

फ़िल्म‘आंधी’ का संगीत अपने समय का सुपरहिट संगीत बना। आर डी बर्मन का म्यूजिक इसे आर्ट फ़िल्म बनने नहीं देता और सुचित्रा सेन व संजीव कुमार को जिस तरह परदे पर गुलज़ार ने पेश किया, वह कमर्शियल सिनेमा के उस दौर के खांचे में फिट नहीं होता था।

फ़िल्म के गानों‘तेरे बिना ज़िंदगी से कोई शिकवा तो नहीं..’ ‘तुम आ गए हो नूर आ गया है..’ और ‘इस मोड़ से जाते हैं..’ ऐसे गाने हैं, जिनके तेवर आज तक लोग नहीं भूले हैं। गुलजार ने इन गानों का चित्रण परदे पर ऐसे किया है जैसे ज़िंदगी उनके कैमरे की रील को पगडंडी बनाकर बस चल पड़ी है, एक ऐसे सफ़र पर जिसमें मंज़िल का पता उसको भी नहीं है। वह बस सफर का सुख पाना चाहती हैं।

फ़िल्म‘आंधी’को रिलीज़ हुए बीते साल ही 50 साल हो गए। लेकिन, इस फ़िल्म को देखकर समझ ये भी आता है कि भारत की राजनीति में इतने साल में भी कुछ खास बदलाव हुए नहीं हैं। फ़िल्म शुरू होती ओम शिवपुरी के भाषण से। पता चलता है कि आरती देवी नाम की महिला की लोकप्रियता यहां निशाने पर है। और, अगले ही सीन में सुचित्रा सेन दिखती हैं आरती देवी के किरदार में।

तन पर खादी साड़ी है। आंखों पर चश्मा है। आसपास बैठे लोग समझा रहे हैं। फ़िल्म के शुरू के 20-25 मिनट गुलज़ार उस समय का सियासी परिदृश्य बहुत ही बारीकी से समझाते हैं। बहुत कुछ वह कहते हैं और जो अनकहा है, उसका असर भी कहे से ज्यादा होता है। चंद्रसेन का जब अखबार के एक संपादक से सामना होता है और वह कहता है, “इलेक्शन से पहले आप हमारा ध्यान रखिए और उसके बाद हम आपका।”

फ़िल्म‘आंधी’ से पहले ही गुलज़ार बतौर फ़िल्ममेकर खुद को हिंदी सिनेमा में स्थापित करचुके थे। लेकिन, इस फ़िल्म में सुचित्रा सेन का आना खुद गुलज़ार के लिए भी एक उपलब्धि रही। इस फ़िल्म के लिए सुचित्रा सेन को राज़ी करने से पहले गुलज़ार निर्देशक सोहन लाल कंवर की फ़िल्म केलिए एक पटकथा सुचित्रा सेन को सुना चुके थे। तब सुचित्रा ने इसमें तमाम फेरबदल सुझाए थे और गुलज़ार को जो जानते हैं, तभी समझ गए थे ये फ़िल्म अब बनने से रही।

गुलज़ार को ज्ञान देने वाले कम ही सुहाते हैं। सोहन लाल कंवर की वो फ़िल्म शुरू होने से पहले ही बंद हो गई। लेकिन, बताते हैं कि जब गुलज़ार दूसरी बार अपनी फ़िल्म‘आंधी’ की कहानी सुनाने सुचित्रा सेन के पास पहुंचे तो उन्होंने आंख मूंदकर फ़िल्म स्वीकार कर ली। एक महत्वाकांक्षी पिता और डूब कर प्रेम करने वाले पति के बीच बंटी एक सियासी महिला की कहानी ‘आंधी’ को देखना देश को समझने जैसा है।

‘आंधी’ हिंदी सिनेमा में महिला किरदारों पर आधारित फ़िल्मों की वो उड़ान है, जिसतक पहुंच पाना तो दूर की बात है, उस दिशा में उड़ने की सोचना भी नई पीढ़ी के फ़िल्मकारों के लिए आसान नहीं। ‘बाइस्कोप विद पंकज शुक्ल’ में आज इतना ही, जल्द ही फिर मिलेंगे किसी और सुपरहिट फ़िल्म के क़िस्सों के साथ..!

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