देश में संगीत से जुड़ा बच्चा बच्चा, एक नाम आते ही तुरंत अपना सिर श्रद्धा से झुका देता है। ये हैं सुरों की वह साध्वी, जिन्होंने ख़ामोशी को भी राग बना दिया,यानी,अन्नपूर्णा देवी। पांच वक़्त की नमाज़ी रहीं रोशनआरा ख़ान से वह सुबह-शाम मंदिर का दीया जलाने वाली अन्नपूर्णा देवी कैसे बनीं? वहां तक जाने से पहले उनका थोड़ा सा परिचय और।
ये तो आप भी मानते होंगे कि कुछ कलाकार मंच पर खड़े होकर अमर होते हैंऔर कुछ कलाकार मंच से उतरकर भी अमर रहते हैं। अन्नपूर्णा देवी उन्हीं विरले कलाकारों में थींजिन्होंने अपनी पूरी ज़िन्दगी सुरों को साधा, मगर सुरों को कभी बाज़ार में नहीं उतारा। उन्होंने संगीत को पेशा नहीं बनने दिया, पूजा ही रहने दिया। और शायद यही वजह है कि उनके बारे में जितना कहा गया, उससे कहीं ज़्यादा आज भी अनकहा है। न वह कंसर्ट के बदले पैसा लेने में यक़ीन रखती थीं और न ही उन्होंने कभी अपने किसी शिष्य से ही गुरुदक्षिणा के नाम तक पर कुछ लिया।
23 अप्रैल 1926 को मैहर की धरती पर जन्मी रोशनआरा ख़ानजो आगे चलकर अन्नपूर्णा देवी बनीं, संगीत की उस परंपरा में जन्मी थीं जहां राग केवल सीखे नहीं जाते, जिए जाते हैं। उनके पिता उस्ताद अलाउद्दीन ख़ान सिर्फ़ उनके गुरु नहीं थे, एक संपूर्ण संगीत-संस्थान थे।
(अन्नपूर्णा देवी के जन्म की तिथि अलग अलग स्थानों पर अलग अलग मिलती है। उनके निधन के बाद मुंबई महानगर पालिका ने अपनी वेबसाइट पर उनको जो श्रद्धांजलि दी, उसमें उनकी तिथि 23 अप्रैल 1927 ही बताई गई है।)
कहा जाता है कि रोशनआरा ख़ान के जन्म के समय उस्ताद अलाउद्दीन ख़ान बाहर थे, तब मैहर के महाराजा ने इस बच्ची का नाम ‘अन्नपूर्णा’ रखाऔर सचमुच, आगे चलकर उन्होंने संगीत की दुनिया को अन्न की तरह ही पोषित किया।
घर में पहले तय था कि उन्हें संगीत नहीं सिखाया जाएगा। मगर एक दिन उस्ताद अलाउद्दीन ख़ान ने देखा कि छोटी-सी अन्नपूर्णा अपने बड़े भाई को वही सुधार बता रही हैं, जो अभी-अभी उन्हें सिखाया गया था।
पिता समझ गए, यह बच्ची शागिर्द नहीं, परंपरा बनेगी। फिर शुरू हुई वह तालीम, जिसकी सख़्ती के किस्से आज भी संगीत-जगत में आदर से सुनाए जाते हैं। पहले गायन, फिर सितार, और आख़िरकार सुरबहार, एक ऐसा वाद्य जिसे उन्होंने सिर्फ़ साधा नहीं, उसे एक आध्यात्मिक ऊंचाई दी।
कहा जाता है कि सुरबहार उनके लिए भारी था, तो उस्ताद अलाउद्दीन ख़ान ने उसके लिए विशेष हल्का सुरबहार बनवाया। यह घटना सिर्फ़ एक वाद्य का हल्का होना नहीं थी, यह एक परंपरा का अपनी उत्तराधिकारी के लिए झुकना था।सुरबहार की आवाज़ में एक गहराई होती है, जैसे कोई नदी भीतर-भीतर बह रही हो। अन्नपूर्णा देवी उस नदी की साध्वी थीं।
उनका आलाप इतना विस्तार लेता था कि श्रोता समय भूल जाते थे। राग ‘यमन कल्याण’ हो या ‘मंज खमाज’, वे राग को बजाती नहीं थीं—उसे खोलती थीं, जैसे कोई धीरे-धीरे एक रहस्य का परदा हटाता है।एक बार उन्होंने कहा था, “राग को समझे बिना उसे सजाना वैसा है जैसे किसी अजनबी का चित्र बना देना।”
यह सिर्फ़ टिप्पणी नहीं थी, यह अन्नपूर्णा देवी का संगीत-दर्शन था। 17 की थीं रोशनआरा और 21 के थे रवि शंकर, जब दोनों के रिश्ते की बात चली। दोनों परिवार समझ गए थे कि उस्ताद अलाउद्दीन खान के ये दोनों शागिर्द अब नई संगत बनाने बिना मानेंगे नहीं। रोशनआरा की मां बताते हैं पहले हिंदू ही थीं, उन्होंने भी इस विवाह के लिए ज़ोर दिया और मां के कहने पर ही रोशनआरा ने हिंदू धर्म में वापसी कर ली।
अगर आपने निर्देशक ऋषिकेश मुखर्जी की फ़िल्म ‘अभिमान’ देखी है तो आपको इस रिश्ते की झलक मिल सकती है। ये फ़िल्म बनाने से पहले ऋषिकेश मुखर्जी ने अन्नपूर्णा देवी से कई मुलाक़ातें की। उनकी अनुमति से वे क़िस्से इस फ़िल्म में शामिल किए जो बस उन्हें ही पता थे।
जब भी रविशंकर और अन्नपूर्णा देवी एक साथ मंच पर होते, समीक्षक, आलोचक, संगीतप्रेमी, सब अन्नपूर्णा देवी की प्रस्तुतियों की तारीफ़ के पुल बांध देते। इसे लेकर ही घर में कलह शुरू हुई और एक दिन अन्नपूर्णा देवी ने अपना विवाह बचाने के लिए अपना संगीत त्याग दिया
और, यहीं से शुरू होती है उनकी ज़िन्दगी की वह सबसे रहस्यमयी परत जिसे समझने में आज भी लोग लगे रहते हैं। अन्नपूर्णा देवी संगीत का व्यवसाय बनाने के सख़्त ख़िलाफ़ थीं। अपने कार्यक्रमों की रिकॉर्डिंग तक की अनुमति वह नहीं देती थी। आज जो उनके कुछ राग उपलब्ध हैं, वे भी शिष्यों द्वारा छुपकर रिकॉर्ड किए गए थे।
मुंबई में रहते हुए नेशनल सेंटर फ़ॉर परफ़ॉर्मिंग आर्ट्स से लेकर अपने ‘आकाशगंगा’ अपार्टमेंट के घर तक, उन्होंने बहुत कम शिष्यों को स्वीकार किया, मगर जिन्हें स्वीकार किया, उन्हें पूरी तरह गढ़ा।उनके शिष्य उन्हें ‘गुरुमा’ कहते थे।
अन्नपूर्णा देवी की तालीम का एक नियम बड़ा दिलचस्प था। वह शिष्य को उसकी वर्तमान योग्यता के हिसाब से नहीं, उसकी संभावना के हिसाब से सिखाती थीं।
यानी शिष्य जहां खड़ा है, वहां नहीं… जहां पहुंच सकता है, वहां से शिक्षा शुरू होती थी। एक प्रसिद्ध क़िस्सा है। जब हरिप्रसाद चौरसिया उनके पास पहुंचे, तो वह पहले से स्थापित बाँसुरी-वादक थे। मगर अन्नपूर्णा देवी ने उनसे कहा, “पहले सब भूल जाइए।”
उन्होंने महीनों तक हरिप्रसाद चौरसिया को सिर्फ़ आलाप का अभ्यास कराया, वह भी गाकर। बांसुरी हाथ में लेने की अनुमति बहुत बाद में मिली।गुरुमा का कहना था, “वाद्य बाद में आता है, स्वर पहले आता है।”
एक और प्रसंग अक्सर उनके शिष्यों द्वारा सुनाया जाता है। वह कई बार शिष्यों से कहती थीं—कमरे की बत्ती बुझाकर अभ्यास करो।क्योंकि अन्नपूर्णा देवी के अनुसार, जब आंखें बंद होती हैं, तब कान खुलते हैं… और जब कान खुलते हैं, तब राग बोलता है।
यह कोई तकनीक नहीं थी। यह साधना का तरीक़ा था।
अन्नपूर्णा देवी की एक और ख़ासियत थी, वह कभी नहीं चाहती थीं कि उनके सभी शिष्य एक जैसे सुनाई दें।वह कहती थीं, “मेरे जैसा मत बजाओ… अपने जैसा बजाओ।”इसीलिए उनके शिष्यों की आवाज़ अलग-अलग रही, मगर सबमें उनकी गुरुमा की छाया दिखाई देती रही।
वह छाया जो सबसे पहले उनके पिता और उनके पहले गुरु उस्ताद अलाउद्दीन खान ने समझी थी। अन्नपूर्णा देवी बिना किसी संगीत शिक्षा के उन दिनों वे सारी सरगम मिनटों में दोहरा देती थीं, जिन्हें याद करने में दूसरे शिष्यों को कई कई दिन लग जाते थे।
अन्नपूर्णा देवी को‘पद्म भूषण’, ‘संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार’ और उसकी फ़ेलोशिप जैसे सम्मान मिले, मगर सच यह है कि उन्हें किसी सम्मान की ज़रूरत नहीं थी। सम्मानों को उनकी ज़रूरत थी।
रविशंकर से अलग होने के बाद उन्होंने अपने से काफ़ी छोटे अपने ही एक शिष्य ऋषिकुमार पांड्या से विवाह किया। लंबे समय तक मुंबई के बी डी रोड स्थित‘आकाशगंगा’ अपार्टमेंट में रहीं। विदेशी नस्ल के अपने पालतू कुत्ते से उन्हें बहुत स्नेह था।
13 अक्टूबर 2018 को उन्होंने देह छोड़ी।मगर सच तो यह हैकि अन्नपूर्णा देवी जैसी हस्तियां जाती नहीं हैं। वे रागों में बस जाती हैं। वे शिष्यों की उंगलियों में बस जाती हैं। वे आलाप की पहली सांस में बस जाती हैं।
और शायद इसीलिए आज भी संगीत-जगत में जब कोई बहुत गहरी, बहुत सच्ची, बहुत तपस्विनी-सी ध्वनि सुनाई देती है, तो लोग धीरे से कहते हैं,“यह कहीं न कहीं गुरुमा की ही परछाईं है…!” जै जै..!!
अन्नपूर्णा देवी
जन्म: 23 अप्रैल 1927 – मैहर (मध्य प्रदेश)
निधन: 13 अक्टूबर 2018 – मुंबई (महाराष्ट्र)








