फ़िल्मी हूं नेटवर्क, मुंबई: हिंदी सिनेमा में कुछ करियर ऐसे भी होते हैं, जिन्हें सिर्फ़ सफलताओं या असफलताओं से नहीं, बल्कि एक अजीब-सी निरंतरता से पढ़ा जाता है। पूजा हेगड़े का हिंदी फ़िल्मी सफ़र कुछ ऐसा ही है, जहाँ बड़े नामों की चमक हर बार साथ रही, मगर बॉक्स ऑफिस का नतीजा जैसे किसी एक ही धुन पर अटका रहा। अब जब उनकी नई फ़िल्म ‘है जवानी तो इश्क़ होना है’ वरुण धवन के साथ रिलीज़ की दहलीज़ पर खड़ी है, तो एक बार फिर वही सवाल हवा में तैर रहा है, क्या इस बार कहानी बदलेगी, या सिलसिला यूँ ही जारी रहेगा?
इससे ठीक पहले आई ‘देवा’ (2025), जिसमें उनके साथ शाहिद कपूर थे। एक स्टाइलिश एक्शन-ड्रामा के तौर पर पेश की गई इस फ़िल्म से उम्मीदें काफी थीं, लेकिन न तो कहानी दर्शकों को बांध पाई और न ही बॉक्स ऑफिस पर वह असर दिखा, जिसकी दरकार थी। पूजा हेगड़े की मौजूदगी यहाँ भी सलीकेदार और ग्लैमरस रही, मगर फ़िल्म की कमजोर पकड़ उनके हिस्से कोई ठोस उपलब्धि नहीं जोड़ सकी।
फिर बारी आती है 2023 की ‘किसी का भाई किसी की जान’ की, जहाँ वह सलमान ख़ान जैसे बड़े स्टार के साथ नज़र आईं। यह फ़िल्म पूरी तरह स्टार पावर पर टिकी थी, और पूजा का किरदार भी उसी ढांचे में ढला हुआ था—चमकदार, लेकिन सीमित। दर्शकों ने फ़िल्म को वैसा प्यार नहीं दिया, जैसा उम्मीद की जा रही थी, और एक बार फिर पूजा के खाते में हिंदी सिनेमा की एक और फीकी पेशकश जुड़ गई।
अब थोड़ा पीछे चलें तो 2022 में उनकी दो बड़ी रिलीज़ रहीं—‘सर्कस’ और ‘राधेश्याम’। ‘सर्कस’ में रणवीर सिंह के साथ उनकी जोड़ी बनी, लेकिन रोहित शेट्टी की यह कॉमेडी अपने शोर-शराबे के बावजूद दर्शकों को हंसा नहीं पाई। वहीं ‘राधेश्याम’ में प्रभास के साथ उनका एक अलग, रोमांटिक और विज़ुअली भव्य रूप सामने आया। फ़िल्म की भव्यता चर्चा में रही, मगर कहानी की सुस्ती और कमजोर जुड़ाव ने इसे भी उम्मीद के मुताबिक उड़ान नहीं भरने दी।
इससे पहले 2019 में ‘हाउसफुल 4’ आई, जहाँ अक्षय कुमार के साथ पूजा हेगड़े एक बड़े मल्टीस्टारर सेटअप का हिस्सा बनीं। फ़िल्म ने बॉक्स ऑफिस पर कुछ कमाई ज़रूर की, लेकिन इसे समीक्षात्मक तौर पर खास सराहना नहीं मिली। पूजा का किरदार यहाँ भी भीड़ में मौजूद था, मगर उस तरह उभर नहीं पाया, जो किसी अभिनेत्री के करियर को नई दिशा दे सके।
और सबसे पीछे, 2016 की ‘मोहनजो दाड़ो’, जहाँ उन्होंने ऋतिक रोशन के साथ हिंदी सिनेमा में कदम रखा। आशुतोष गोवारिकर की इस महत्वाकांक्षी पीरियड फ़िल्म से बड़ी उम्मीदें थीं, लेकिन न तो फ़िल्म दर्शकों को लुभा पाई और न ही बॉक्स ऑफिस पर अपनी लागत वसूल सकी। यह डेब्यू, जो एक बड़े लॉन्च के तौर पर देखा जा रहा था, अंततः एक अधूरी शुरुआत बनकर रह गया।
देखा जाए तो हिंदी सिनेमा में पूजा हेगड़े का यह तिलिस्म सचमुच हैरान करता है—सुपरस्टार अनेक, नतीजा हर बार एक। कमाल की कन्सिस्टेंसी है, मगर उलटी दिशा में। इसके बावजूद, उनकी स्क्रीन प्रेज़ेन्स, ग्लैमर और बड़े प्रोजेक्ट्स का हिस्सा बनने की क्षमता उन्हें लगातार मौके दिलाती रही है। अब नज़रें ‘है जवानी तो इश्क़ होना है’ पर टिक गई हैं—क्या यह फ़िल्म इस सिलसिले को तोड़ेगी, या फिर यह कहानी भी उसी पैटर्न की एक और कड़ी बन जाएगी?






