जुनैद ख़ान के लिए ‘एक दिन’ सिर्फ एक नई रिलीज़ नहीं, बल्कि अपनी अलग पहचान गढ़ने की कोशिश है।
आमिर ख़ान के बेटे होने का दबाव उनके साथ लगातार जुड़ा रहा है, और इसी वजह से हर फ़िल्म उनके लिए अभिनय से ज़्यादा इम्तिहान बन जाती है। ओटीटी पर आई ‘महाराज’ से उन्हें शुरुआती सराहना मिली थी, लेकिन बड़े परदे पर उनकी मौजूदगी को लेकर अब भी सवाल बने हुए हैं।
एक विदेशी फ़िल्म की रीमेक के तौर पर बनी फ़िल्म ‘एक दिन’ उनके लिए एक संवेदनशील प्रेमकथा के सहारे दर्शकों के दिल तक पहुंचने का मौक़ा है। लेकिन, लगता यही है कि अपनी पिछली फ़िल्म ‘लवयापा’ की तरह ही वह यहां भी चूक गए हैं। संकोची और भीतर से अकेले युवकवह निजी ज़िंदगी में हैं ही और यहां किरदार भी उन्हें वैसा ही मिला। लेकिन, मामला जमा नहीं है।
जुनैद के सामने समस्या ये है कि वह चाहें भी तो अपने पिता आमिर ख़ान की छाया से निकल नहीं सकते। आमिर ख़ान ने उन्हें छाते की तरह ऊपर से घेर रखा है। हर फ़िल्म की शूटिंग आमिर की निगरानी में हो रही है। ये फ़िल्म भी अरसे से बनी पड़ी थी, और अब जाकर रिलीज़ हो रही है। जुनैद असल में क्या करना और कहना चाहते हैं, ये सामने आना अभी बाकी है।
फ़िल्म ‘एक दिन’ वैसे तो निर्माता आमिर ख़ान ने अपने बेटे के लिए ही बनाई है और ट्रेड को इससे ज़्यादा उम्मीदें भी नहीं थीं। लेकिन, जल्द ही रणबीर कपूर की फ़िल्म ‘रामायण’ में सीता बनकर दिखने जा रहीं दक्षिण भारतीय सिनेमा की सशक्त अभिनेत्री साई पल्लवी की हिंदी सिनेमा में लॉन्चिंग पर सबकी नज़रें रहीं। वह अपनी मासूमियत से लोगों का ध्यान तो अपनी तरफ़ खींचती हैं, लेकिन ‘सदमा’ की श्रीदेवी के सामने वह उन्नीस तो क्या सोलह-सत्रह भी नहीं बैठती हैं।
जुनैद ख़ान के साथ एक ताज़ा जोड़ी बनाना और पूरी फ़िल्म को भावनात्मक, शालीन और पारिवारिक रोमांस की तरह पेश करना अपने आप में साहसी फ़ैसला तो है और रिलीज़ से पहले फ़िल्म ने सम्मानजनक चर्चा भी बटोरी। लेकिन, ये फ़िल्म थियेटर मटीरियल नहीं है। इसे सीधे ओटीटी पर ही रिलीज़ किया जाना बेहतर होता।
तारीफ़ फ़िल्म ‘एक दिन’ की इसलिए की जा सकती है कि ये हिंसा और शोरगुल से भरे दौर में यह एक रूमानी और सादगीभरी प्रेमकथा है। मौजूदा सिनेमाई माहौल से अलग और राहत देने वाला इसका एहसास भी अच्छा है।
फ़िल्म का संदेश भी यही है कि प्रेम हमेशा शोर से नहीं, कभी-कभी ख़ामोशी से भी जन्म लेता है।
फ़िल्म ‘एक दिन’ की कहानी एक ऐसे दिन के इर्द-गिर्द घूमती है जो दो ज़िंदगियों को बदल देता है। जापान की बर्फ़ीली वादियां, कॉरपोरेट जीवन की नीरसता और निजी भावनाओं की गर्माहट का इसमें सुंदर मेल दिखाई देता है।
तकनीकी पक्षों में फ़िल्म ‘एक दिन’ मज़बूत दिखाई देती है। सिनेमैटोग्राफ़ी इसकी सबसे बड़ी ताक़त है। जापान के दृश्य बेहद आकर्षक और रूमानी एहसास जगाते हैं। कैमरा किरदारों की तन्हाई और नज़दीकियों दोनों को ख़ूबसूरती से पकड़ता है।
फ़िल्म ‘एक दिन’ का संगीत मधुर है और गीत कहानी का बोझ नहीं बढ़ाते, बल्कि उसे सहारा देते हैं। बैकग्राउंड स्कोर भावनात्मक दृश्यों को सहारा देता है। फ़िल्म का स्वभाव नर्म है; इसकी असली ऊर्जा संवादों, नज़रों और रिश्तों की हलचल में है।
‘एक दिन’ दो दिलों की छोटी-सी कहानी है; इसका निर्देशन ही इसका सबसे कमज़ोर पहलू है। साथ ही जुनैद की एक्टिंग में अभी और बहुत सारे रंग आने बाक़ी हैं। फ़िल्म अपना असर गहरा कर सकती थी, लेकिन अब उसमें देर हो चुकी है।
कुछ दिन बाद फ़िल्म ओटीटी पर होगी और तब आप चाहें तो इसे पूरे परिवार के साथ देख सकते हैं।





