भारतीय सिनेमा के इतिहास में जब भी भव्यता और जुनून की बात होती है, तो निर्देशक के. आसिफ की मास्टरपीस ‘मुग़ल-ए-आज़म’ का नाम सबसे ऊपर आता है। इस फिल्म का हर सीन एक मिसाल है, लेकिन ‘प्यार किया तो डरना क्या’ गाने के लिए बनाया गया ‘शीश महल’ आज भी फिल्म निर्माण की दुनिया के लिए एक अजूबा माना जाता है।
बेल्जियम से आया कांच और दो साल की मेहनत
इस गाने के सेट को हकीकत में तब्दील करने के लिए के. आसिफ ने कोई कसर नहीं छोड़ी थी। महल की दीवारों और छतों पर कांच की नक्काशी करने के लिए विशेष रूप से बेल्जियम से रंगीन कांच मंगाया गया था। इस भव्य सेट को तैयार करने में कारीगरों की एक बड़ी टीम को दो साल का लंबा समय लगा था। उस दौर में जब तकनीक इतनी उन्नत नहीं थी, हाथों से की गई यह नक्काशी आज के समय के वीएफएक्स (VFX) को भी मात देती है।
कैमरा लेंस पर लपेटना पड़ा था मलमल का कपड़ा
शीश महल इतना चमकदार और जादुई था कि शूटिंग के दौरान एक बड़ी तकनीकी समस्या खड़ी हो गई। कांच पर जब तेज लाइटें पड़ती थीं, तो उनका परावर्तन (Reflection) इतना जबरदस्त होता था कि कैमरे में सब कुछ सफेद नजर आने लगता था। इस चमक को नियंत्रित करने के लिए और मधुबाला के चेहरे पर सॉफ्ट लाइट बनाए रखने के लिए, सिनेमेटोग्राफर आर.डी. माथुर ने एक अनोखा तरीका अपनाया। उन्होंने कैमरा लेंस पर मलमल का कपड़ा लपेट दिया था ताकि रोशनी छनकर आए और सेट की खूबसूरती पर्दे पर सही ढंग से उतर सके।
पूरी फिल्म के बजट से भी महंगा था एक सेट
कहा जाता है कि उस जमाने में इस एक सेट को बनाने में जितना खर्च आया था, उतने में उस दौर की दो-तीन पूरी फिल्में बन सकती थीं। के. आसिफ की इस जिद और कारीगरों की दो साल की मेहनत ने ही ‘मुग़ल-ए-आज़म’ को सिर्फ एक फिल्म नहीं, बल्कि भारतीय सिनेमा की एक ‘अमर विरासत’ बना दिया।







