हेमा मालिनी आज भी दुनिया के लिए वही ‘ड्रीम गर्ल’ हैं। राज कपूर के साथ ‘सपनों का सौदागर’ से शुरुआत करने वाली हेमा को ‘जॉनी मेरा नाम’ और ‘अंदाज’ जैसी फिल्मों ने पहचान तो दिलाई, लेकिन उनके करियर की दिशा बदलने का काम फिल्म ‘सीता और गीता’ ने किया। इस कल्ट क्लासिक की रिलीज के 50 वर्ष पूरे होने पर हेमा मालिनी ने वरिष्ठ फिल्म समीक्षक पंकज शुक्ल से अपने जीवन के कुछ अनछुए पहलुओं पर चर्चा की।
इस संवाद में उन्होंने न केवल संजीव कुमार की उनके प्रति दीवानगी पर बात की, बल्कि एक अन्य अभिनेता का भी जिक्र किया जो उन पर जान छिड़कते थे। साथ ही, उन्होंने एक भावुक संयोग साझा किया कि जिस घर के सामने उन्होंने कभी इस फिल्म के लिए नृत्य किया था, आज उनकी बेटी वहीं निवास करती हैं।

जब पहली बार आपको ‘सीता और गीता’ का विचार बताया गया, तो आपका क्या रिएक्शन था? चूंकि यह ‘राम और श्याम’ से प्रेरित थी, क्या आपको कोई संकोच हुआ?
सच कहूं तो उन दिनों मुझे अंदाजा भी नहीं था कि मेरा करियर इतना विशाल होगा। मैं उस समय मद्रास (चेन्नई) में रहती थी और वहीं मैंने सिनेमाहॉल में दिलीप कुमार जी की ‘राम और श्याम’ देखी थी। फिल्म बहुत पसंद आई थी, पर कभी सोचा नहीं था कि उसी कहानी का फीमेल वर्जन मैं करूंगी। मैं रमेश सिप्पी जी के साथ फिल्म ‘अंदाज’ कर रही थी। शम्मी कपूर और राजेश खन्ना जैसे सुपरस्टार्स के बीच मैं काफी नई थी। ‘अंदाज’ की डबिंग के वक्त ही रमेश जी ने मुझे एक डबल रोल वाली स्क्रिप्ट का हिंट दिया था।
रमेश जी ने आपको इस रोल के लिए कैसे मनाया? सुना है कि उन्होंने शुरुआत में किसी और अभिनेत्री का नाम लिया था?
फिल्म इंडस्ट्री में निर्देशक अक्सर कलाकारों को सीधे नहीं बताते। रमेश जी ने पहले मुझसे पूछा कि क्या मैंने ‘राम और श्याम’ देखी है? फिर बोले कि हम वैसी ही कहानी बना रहे हैं, लेकिन लेडीज वर्जन। शायद पहले उनके मन में मुमताज का नाम था, इसलिए मैंने ज्यादा उत्साह नहीं दिखाया। लेकिन कुछ दिनों बाद उन्होंने मुझसे पूछा कि क्या मैं यह फिल्म करना चाहूंगी? मेरा जवाब था—बिल्कुल! मुझे लगा कि रमेश जी मुझे पहले ही तय कर चुके थे, बस वो मेरे अंदर उस किरदार के प्रति उत्तेजना पैदा करना चाहते थे।
प्रश्न: शूटिंग के दौरान ‘सीता’ और ‘गीता’ के अलग-अलग व्यक्तित्वों को निभाने के लिए रमेश जी आपकी कैसे मदद करते थे?
वह सीन समझाने के लिए धीरे से बताते थे कि यह सीता का हिस्सा है या गीता का। लेकिन असल में, जैसे ही मैं कॉस्टयूम पहनती थी, मेरे हाव-भाव खुद बदल जाते थे। साड़ी पहनी तो सीता की शालीनता आ जाती और जैसे ही गीता वाले दो चोटी, टैटू और घाघरा पहना, मेरी चाल-ढाल में एक अलग ही तेजी आ जाती थी। उस घाघरे का घेर इतना बड़ा था कि हिलते ही वह लहराने लगता था। मेकअप और कपड़े ही मेरे लिए अभिनय की चाबी थे।
फिल्म का गाना ‘जिंदगी है खेल कोई…’ मुंबई की सड़कों पर शूट हुआ था। वहां से गुजरते वक्त क्या यादें ताजा होती हैं?
वह पूरा गाना मुंबई के अलग-अलग कोनों जैसे नरीमन पॉइंट और वर्ली में करीब एक हफ्ते तक फिल्माया गया था। एक बहुत ही सुखद संयोग है—वर्ली में जिस पारसी घर के सामने मैंने रस्सी पर चढ़कर और मेज पर नाचकर शूटिंग की थी, आज मेरी बेटी (एहना) उसी घर में रहती है। जब मैंने फिल्म देखते हुए उसे बताया, तो उसने अपने बच्चों को भी दिखाया कि तुम्हारी नानी ने यहीं डांस किया था। वहां की पुरानी हाउसकीपर आज भी मुझे याद दिलाती हैं कि मैं शॉट्स के बीच उनके घर के बाहर बैठा करती थी। यह मेरे लिए बहुत भावुक कर देने वाली याद है।
इस फिल्म के लिए आपको पहला फिल्मफेयर मिला। क्या यह आपके करियर का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट था?
निश्चित रूप से। हालांकि मेरी पहली फिल्म ‘सपनों का सौदागर’ का किरदार ‘सीता’ जैसा ही था, लेकिन ‘सीता और गीता’ ने मुझे दो बिल्कुल विपरीत किरदारों को एक साथ जीने का मौका दिया। एक तरफ बेहद शांत स्वभाव और दूसरी तरफ जबरदस्त तेजतर्रार व्यक्तित्व। एक कलाकार के लिए यह बहुत संतुष्टि देने वाला अनुभव था।

कहा जाता है कि ‘शोले’ की ‘बसंती’ का किरदार कहीं न कहीं ‘गीता’ का ही विस्तार था। वह रोल आपको कैसे मिला?
रमेश सिप्पी ने बसंती का रोल बड़े अजीब तरह से ऑफर किया था। ‘सीता और गीता’ में मैं मुख्य भूमिका में थी और धरम जी व संजीव जी साइड में थे। ‘शोले’ की कहानी सुनाते वक्त रमेश जी ठाकुर, जय और वीरू की बातें कर रहे थे। मैंने पूछा, “मैं कहाँ हूँ?” तो उन्होंने कहा कि एक तांगेवाली का रोल है। मुझे लगा कि यह तो बहुत छोटा रोल है। मैंने तुरंत ‘हाँ’ नहीं कहा। रमेश जी को बुरा भी लगा। अंत में मेरी माँ ने मुझे समझाया कि रमेश जी ने तुम्हारे साथ इतनी सफल फिल्में की हैं, तो तुम्हें मना नहीं करना चाहिए। माँ के कहने पर मैंने हाँ की और देखिए, बसंती का किरदार इतिहास बन गया।

फिल्म ‘सीता और गीता’ ने उस जमाने में भारी कमाई की थी। क्या आप लोग तब बॉक्स ऑफिस कलेक्शन पर ध्यान देते थे?
नहीं, तब हम कलाकारों को ज्यादा जानकारी नहीं होती थी। बस इतना पता चलता था कि फिल्म ‘हिट’ है। स्टंट मास्टर शेट्टी साहब या अन्य साथी कलाकार बताते थे कि फिल्म बहुत बड़ा नाम कर रही है। हमें बस इतना ही पता चलता था कि सिनेमाघरों में भीड़ बढ़ रही है।

संजीव कुमार और धर्मेंद्र के साथ शूटिंग के दौरान का माहौल कैसा था? कुछ अनकहे किस्से?
उस समय हम सब युवा थे और सेट पर काफी रोमांस का माहौल रहता था। सलीम-जावेद और हनी ईरानी की प्रेम कहानी चल रही थी। जहां तक संजीव कुमार जी की बात है, वह मुझमें काफी दिलचस्पी ले रहे थे, पर मुझे इस बात का एहसास बाद में हुआ जब रमेश सिप्पी ने मुझे बताया। धरम जी के साथ तब मेरा वैसा कुछ नहीं था, पर वह काफी प्रोटेक्टिव जरूर थे। एक अभिनेता रूपेश कुमार भी मेरे पीछे काफी पागल थे। सेट पर काम के साथ-साथ यह गपशप, जासूसी करने वाले हेयर ड्रेसर और मेकअप मैन, यह सब उस दौर को बहुत रोचक बनाते थे।
‘सीता और गीता’ के बाद ‘चालबाज’ जैसी फिल्में भी आईं। क्या आपने वह देखी?
हाँ, मैंने ‘चालबाज’ देखी और श्रीदेवी ने उसमें शानदार काम किया। एक ही फिल्म में दो अलग रंग दिखाना हुनर की बात है। मैंने अपने करियर में सात फिल्मों में डबल रोल किए हैं, लेकिन हर फिल्म ‘सीता और गीता’ जैसा जादू पैदा नहीं कर पाती।
क्या सेट पर कभी तनाव या झगड़े भी होते थे?
झगड़े तो नहीं, लेकिन बहस खूब होती थी। सलीम-जावेद नए थे और स्क्रिप्ट को बेहतर करने के लिए घंटों चर्चा करते थे। कई बार हम मेकअप लगाकर घंटों इंतजार करते थे क्योंकि सीन में कोई नया ट्विस्ट जोड़ा जा रहा होता था। उस समय काम में बहुत गहराई और जुनून था, जो आज फिल्मों में कम ही दिखता है।





