फिल्म स्कूल से निकलते ही क्या मिल जाता है निर्देशन का मौका? पंकज सर ने दूर किया भ्रम

आपके सवाल 
पंकज सर के जवाब

“फ़िल्मी हूं” के पाठकों के लिए हम वरिष्ठ फ़िल्म समीक्षक, लेखक, निर्माता और निर्देशक पंकज शुक्ल का एक ख़ास कॉलम शुरू कर रहे हैं। इस कॉलम के तहत वह हर हफ़्ते उन पाठकों के उत्तर दिया करेंगे, जिन्हें सिनेमा में काम करने में रुचि है। पंकज सर पिछले साढ़े तीन दशकों से फ़िल्म पत्रकारिता में हैं, और उन्होंने स्टूडियो के गलियारों से लेकर रंगमंच के बैकस्टेज तक सब देखा है।

1. फ़िल्म को निर्देशित करने का मौक़ा मिलना एक आउटसाइडर के लिए कितना कठिन है? – शमीम अहमद, हैदराबाद

साफ़ शब्दों में कहूं तो—कठिन है, लेकिन असंभव नहीं। फ़िल्म इंडस्ट्री में “आउटसाइडर” होने का मतलब है, कोई पारिवारिक या इंडस्ट्री कनेक्शन नहीं होना। यानी, शुरुआत शून्य से करना।
इसकी असल चुनौतियाँ है कि भरोसा जीतना सबसे मुश्किल होता। निर्माता (Producer) पैसा जोखिम में डालता है, उसे नए निर्देशक को मौका देने में झिझक होती है। लेकिन, आज हालात पहले जैसे नहीं हैं। डिजिटल प्लेटफॉर्म ने भी रास्ते खोले हैं, साथ ही शॉर्ट फिल्म, वेब सीरीज़, यूट्यूब से भी पहचान बन सकती है।

निष्कर्ष: रास्ता लंबा है, पर अगर आपके पास स्पष्ट विज़न और धैर्य है, तो दरवाज़े खुलते हैं।

  1. क्या किसी फ़िल्म इंस्टीट्यूट से प्रशिक्षण लेने के तुरंत बाद फ़िल्म निर्देशन का मौक़ा मिल जाता है?– श्वेता पाठक, बिलग्राम, हरदोई (उत्तर प्रदेश)

यह एक आम गलतफहमी है। लेकिन, तुरंत मौका नहीं मिलता। पहले समझिए कि फ़िल्म स्कूल आपको क्या देता है? वह आपको तकनीकी समझ, सिनेमा की भाषा और नेटवर्क, लग भी कुछ हद तक, दे सकता है।

इंडस्ट्री में, आपको अक्सर Assistant Director (AD) के रूप में शुरुआत करनी पड़ती है कई साल तक सीखना और काम करना होता है। फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया और सत्यजीत रे फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट जैसे संस्थानों से निकलने के बाद भी सीधा “डायरेक्टर” बन जाना दुर्लभ है।

निष्कर्ष: ट्रेनिंग आपको तैयार करती है, लेकिन मौका आपको खुद बनाना पड़ता है।

  1. फ़िल्म निर्माताओं से मिलते समय बतौर निर्देशक अपनी फ़िल्म कैसे पिच करें?– आदिनाथ सोनकर, मुंबई

पिचिंग एक कला है—और कई बार यहीं खेल जीत या हार जाता है।

एक प्रभावी पिच में क्या होना चाहिए:

  1. लॉगलाइन (Logline):एक या दो लाइन में पूरी कहानी का सार, दिलचस्प और स्पष्ट
  2. विज़न (Vision):आपकी फिल्म अलग क्यों है? उसका टोन, स्टाइल क्या है?
  3. संदर्भ (References):बहुत ज़रूरी नहीं है।
  4. व्यवहारिकता (Practicality):बजट का अंदाज़ा,  लोकेशन, कास्ट की समझ
  5. आत्मविश्वास,लेकिन ओवरकॉन्फिडेंस नहीं: निर्माता को लगे कि आप कहानी को “देख” सकते हैं

एक बात याद रखें:

आप सिर्फ कहानी नहीं बेच रहे, आप अपनी सोच और भरोसा बेच रहे हैं।

  1. एक निर्देशक को एक अच्छा लेखक भी होना कितना ज़रूरी है?– समीक्षा ढोले, ग्वालियर, मध्य प्रदेश

हर निर्देशक का लेखक होना ज़रूरी नहीं, लेकिन कहानी की समझ बहुत गहरी होनी चाहिए।

निर्देशक ही कहानी को “विज़ुअल” रूप देता है। उसे हर सीन का भाव समझना होता है।

अगर निर्देशक लिख भी सकता है, तो उसकी पकड़ और मजबूत होती है। वह बदलाव तुरंत कर सकता है।

लेकिन,  कई निर्देशक बेहतरीन लेखक नहीं होते, फिर भी सफल होते हैं। वे अच्छे लेखकों के साथ काम करते हैं।

निष्कर्ष: लेखक होना बोनस है, लेकिन कहानी की समझ अनिवार्य है।

  1. क्या एक अच्छी कहानी लिखने वाले को लेकर फ़िल्म निर्देशन के लिए निर्माता से मिलना उचित है?– सारंग विश्वकर्मा, जम्मू

हां, और यह एक बहुत समझदारी भरा कदम है। असल में, यह आपकी ताकत बढ़ाता है। आप अकेले नहीं, एक टीम के रूप में जाते हैं। लेखक आपकी कहानी को बेहतर तरीके से समझा सकता है। निर्माता को भरोसा मिलता है कि स्क्रिप्ट मजबूत है

लेकिन ध्यान रखें, आप दोनों के बीच स्पष्ट तालमेल होना चाहिए। कहानी पर आपकी (निर्देशक की) स्पष्ट दृष्टि होनी चाहिए। कई सफल निर्देशक-लेखक जोड़ियां रही हैं, जिन्होंने इंडस्ट्री में बड़ा काम किया है।

निष्कर्ष: अगर आपके पास एक अच्छा लेखक है, तो उसे साथ लेकर जाना आपके पक्ष में जाता है, बस आपकी भूमिका स्पष्ट होनी चाहिए।

  • Mohammad Faique

    मेरा नाम मोहम्मद फायक अंसारी है और मैं पिछले 9 वर्षों से डिजिटल मीडिया के क्षेत्र में सक्रिय हूं। इस दौरान मुझे समाचार लेखन, संपादन और कंटेंट निर्माण से जुड़ा व्यापक अनुभव प्राप्त हुआ है। मैंने अमर उजाला के मनोरंजन डेस्क पर एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, जहां मैंने फिल्म, टेलीविजन और वेब सीरीज़ से जुड़ी विविध सामग्री पर काम किया। वर्तमान में मैं filmihoon.com के साथ जुड़ा हुआ हूं, जहां मैं मनोरंजन जगत से संबंधित समाचारऔर विश्लेषण प्रस्तुत कर रहा हूं।

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