आपके सवाल
पंकज सर के जवाब
“फ़िल्मी हूं” के पाठकों के लिए हम वरिष्ठ फ़िल्म समीक्षक, लेखक, निर्माता और निर्देशक पंकज शुक्ल का एक ख़ास कॉलम शुरू कर रह हैं। इस कॉलम के तहत वह हर हफ़्ते उन पाठकों के उत्तर दिया करेंगे, जिन्हें सिनेमा में काम करने में रुचि है। पंकज सर पिछले साढ़े तीन दशकों से फ़िल्म पत्रकारिता में हैं, और उन्होंने स्टूडियो के गलियारों से लेकर रंगमंच के बैकस्टेज तक सब देखा है।
- अभिनय क्षेत्र में पहला कदम रखने की सही उम्र क्या है?-शिवाकांत, अमेठी, उत्तर प्रदेश
अभिनय के लिए “सही उम्र” जैसी कोई एक तय सीमा नहीं होती। यह उन गिने-चुने क्षेत्रों में है जहां 6 साल का बच्चा भी शुरुआत कर सकता है और 60 साल का व्यक्ति भी।
वैसे, व्यावहारिक रूप से देखें तो, 10 से 18 वर्ष की आयु, सीखने और प्रयोग करने का सबसे अच्छा समय होता है। थिएटर, स्कूल ड्रामा, वर्कशॉप से इसकी शुरुआत कर सकते हैं।
18 से 30 वर्ष की आयु इंडस्ट्री में सक्रिय रूप से आने का सबसे आम समय है। इस दौरान ट्रेनिंग, ऑडिशन, नेटवर्किंग, सब तेज़ी से होता है। ऐसा नहीं कि 30 साल का होने के बाद सिनेमा में प्रवेश के रास्ते बंद हैं लेकिन तब रास्ता थोड़ा अलग होता है। कैरेक्टर रोल, थिएटर या डिजिटल प्लेटफॉर्म से शुरुआत की जा सकती है।
मैंने अपने करियर में ऐसे कई कलाकार देखे हैं जिन्होंने देर से शुरुआत की, लेकिन गहरी छाप छोड़ी। उदाहरण के तौर पर नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी ने भी संघर्ष के लंबे दौर के बाद पहचान बनाई।
निष्कर्ष: सही उम्र वही है जब आप सच में तैयार हों—मानसिक रूप से और मेहनत करने के लिए।
- क्या बिना ट्रेनिंग अभिनय नहीं किया जा सकता है?– मीनाक्षी, मुरादाबाद
सीधा जवाब तो यही है कि किया जा सकता है, लेकिन, अभिनय एक “नैचुरल” कला ज़रूर है, पर यह “तकनीकी” भी है। बिना ट्रेनिंग के आप शुरुआत तो कर सकते हैं, लेकिन लंबे समय तक टिकना मुश्किल होता है।
ट्रेनिंग आपको कैमरे के सामने व्यवहार, डायलॉग डिलीवरी, बॉडी लैंग्वेज और भावनाओं का नियंत्रण सिखाती है। कई बड़े कलाकारों ने अभिनय की कोई औपचारिक ट्रेनिंग नहीं ली, लेकिन उन्होंने थिएटर या अनुभव से सीखा। दूसरी ओर नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा जैसे संस्थान ने कई दिग्गज कलाकार दिए हैं।
निष्कर्ष: ट्रेनिंग ज़रूरी नहीं, लेकिन बहुत मददगार और अक्सर निर्णायक होती है।
- रंगमंच और सिनेमा के अभिनय में अंतर क्या है?
यह सवाल बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि यहीं से असली समझ शुरू होती है। रंगमंच (थिएटर) में लाइव परफॉर्मेंस होता है। आवाज़ ऊंची और स्पष्ट होनी चाहिए। हाव-भाव अतिरंजित (exaggerated) होते हैं। एक ही बार में पूरा अभिनय करना पड़ता है
वहीं सिनेमा में कैमरा हर छोटी चीज़ पकड़ लेता है। अभिनय सूक्ष्म (subtle) होता है। कई टेक होते हैं, गलती सुधारने का मौका मिलता है। शॉट्स में अभिनय बंटा होता है
थिएटर आपको अनुशासन और गहराई देता है, जबकि सिनेमा आपको तकनीकी समझ देता है। कई कलाकार, जैसे नसीरुद्दीन शाह आदि, थिएटर से आए और उन्होंने कैमरे पर भी कमाल किया।
- अभिनय सीखने की शुरूआत कहां से की जा सकती है?
शुरुआत करने के लिए बड़े शहर या महंगे कोर्स ज़रूरी नहीं हैं। आप इन तरीकों से शुरुआत कर सकते हैं:
- थिएटर ग्रुप जॉइन करें:अपने शहर में छोटे-छोटे रंगमंच समूह खोजें—यहीं से असली सीख मिलती है।
- सरकारी अभिनय संस्थान:फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया, नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा
- खुद से अभ्यास:आईने के सामने एक्टिंग, फिल्मों के सीन दोहराना, अपनी रिकॉर्डिंग करके देखना
- किताबें और फिल्में:अच्छी फिल्मों को देखना ही पर्याप्त नहीं, समझना आना चाहिए।
निष्कर्ष: शुरुआत वहीं से करें जहां आप हैं। जरूरी है निरंतर अभ्यास।
- छोटे शहरों में रहने वाले मध्यम आयवर्ग के युवा क्या ऑन लाइन अभिनय सीख सकते हैं?
आज के समय में तो बिल्कुल कर सकते हैं। डिजिटल प्लेटफॉर्म ने बहुत कुछ बदल दिया है:
YouTube पर फ्री ट्यूटोरियल उपलब्ध हैं। ऑनलाइन वर्कशॉप कर सकते हैं। गूगल मीट या ज़ूम क्लासेस ज्वाइन कर सकते हैं।
लेकिन, एक सच्चाई समझ लीजिए। ऑनलाइन सीखना शुरुआत है, अभिनय की मंज़िल नहीं। आपको प्रैक्टिकल अनुभव लेना ही पड़ेगा, कैमरे के सामने आना पड़ेगा, लोगों के साथ काम करना पड़ेगा। मैंने कई युवाओं को छोटे शहरों से उठकर डिजिटल माध्यम से पहचान बनाते देखा है।
निष्कर्ष: ऑनलाइन सीखना एक बेहतरीन शुरुआत है, लेकिन उसे ज़मीन पर उतारना ज़रूरी है।






